1970- 80 के समय तालाबों से कुम्हार मिट्टी निकालते थे और अपनी चाक से मिट्टी के बर्तन पानी के मटके बनाए जाते थे गांव के लोग मई जून के महीने में अपने मिट्टी के मकानों की मरम्मत करने के लिए बैलगाड़ी से तालाबों की मिट्टी लाते थे जिससे मकानों की मरम्मत की जाती थी यहां तक की खपरैल भी तालाब किनारे बनाए जाते थे, छोटे-छोटे बच्चे अपने अपने चाचा,पापा, दादा ,भैया लोगों से मिट्टी के खिलौने बनवाते थे यहां तक की घर की महिलाएं अपने घरों के साज सज्जा के लिए पुताई रंगाई भी तालाबों की मिट्टी से की जाती थी घरों की रसोईया में चूल्हे भी तालाबों की मिट्टी के हुआ करते थे और तो और लोग बर्तन धुलने नहाने कपड़े धुलने के लिए मई-जून में मिट्टी रख लिया करते थे अपने अपने घरों पर।तालाब अनायास मई-जून में खुद जाते थे और साल भर की तालाबो से गाद निकल आती थी कोई भी डिसिल्टिंग या खुदवाई के लिए बजट नहीं आता था और ना ही तालाबों के नाम पर भ्रष्टाचार हुआ करता था जैसे ही बरसात के समय में प्रथम या दूसरी बारिश में ही तालाब पानी से लबालब भर जाते थे लेकिन आज वर्तमान में बढ़ती आबादी,औद्योगीकरण,शहरीकरण और भौतिकतावादी जीवन के चलते तालाबों पर प्रहार किया गया पहले तो तालाब में आ रहे जल के स्रोतों को नष्ट किया गया धीरे धीरे अतिक्रमण किया जाने लगा कच्चे मकानों की जगह पक्के मकान,मिट्टी के बर्तन की जगह प्लास्टिक फाइबर के बर्तन ले लिए मटके की जगह फ्रिज ने ले लिया मिट्टी के चूल्हे की जगह LPG गैस चूल्हा ले लिया अब तो जो तालाब बचे हैं या तो अपनी जिंदगी से जूझ रहे हैं या फिर विलुप्त हो गए यह हमें जानना होगा कि तालाब नहीं जिंदगी सुख रही है अगर समय रहते नहीं चेते तो तालाबों को सिर्फ किताबों में पढ़ा जाएगा और कहा जाएगा यह जो बस्ती है इस बस्ती का नाम से कभी यहां पर तालाब हुआ करता था और वर्तमान में जल संकट की तबाही सूखे की समस्या जलवायु परिवर्तन सुखते/ लुप्त होते तालाब हैं।तालाब नहीं जिंदगी सूख रही हैं।